अल्मोड़ा। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से चमोली जिले के किसानों के लिए “पर्वतीय कृषि के लिए उच्च मूल्य वाली फसलें और संबंधित उद्यम” विषय पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण 2 से 4 फरवरी तक संस्थान परिसर में संपन्न हुआ, जिसमें चमोली जनपद के वान गांव से आए 30 किसानों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का उद्देश्य उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को ऐसी फसलों और उद्यमों से जोड़ना था, जिनसे कम क्षेत्रफल में अधिक आय प्राप्त की जा सके। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने व्याख्यानों, क्षेत्रीय प्रदर्शन और व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से किसानों को तकनीकी जानकारी और कौशल प्रदान किया। प्रशिक्षण का शुभारंभ 2 फरवरी को नोडल अधिकारी प्रशिक्षण डॉ. कुशाग्रा जोशी की उपस्थिति में हुआ। पहले दिन संस्थान की प्रमुख प्रौद्योगिकियों, जड़ी-बूटियों के उत्पादन और संरक्षण, जैविक खाद निर्माण, कीट प्रबंधन तथा पर्वतीय क्षेत्रों में संभावनाशील फसलों के उत्पादन पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। किसानों को संस्थान के संग्रहालय, अभियांत्रिकी कार्यशाला और प्रायोगिक खेतों का भी भ्रमण कराया गया। 3 फरवरी को संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मीकांत की उपस्थिति में किसानों के साथ पर्वतीय कृषि प्रणाली पर संवाद आयोजित किया गया। उन्होंने बदलते जलवायु परिदृश्य में पर्वतीय कृषि को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए आधुनिक तकनीकों, विशेषकर डिजिटल विपणन और बाजार खोज की दिशा में कदम बढ़ाने का आह्वान किया। इस दिन एकीकृत कृषि प्रणाली, कृषि यंत्रीकरण, सब्जियों की संरक्षित खेती और मशरूम उत्पादन तकनीक पर भी प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही प्रतिभागियों को गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान का भ्रमण कराया गया, जहां उन्हें पर्यावरण प्रबंधन की व्यावहारिक जानकारी मिली। प्रशिक्षण के अंतिम दिन किसानों को प्रगतिशील कृषकों के खेतों में ले जाया गया, जहां उन्होंने उन्नत खेती के प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किए। इस अवसर पर किसानों से संवाद कर प्रशिक्षण को लेकर उनकी प्रतिक्रियाएं ली गईं और उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में अर्जित ज्ञान के प्रसार के लिए प्रेरित किया गया। कार्यक्रम का समापन नोडल अधिकारी डॉ. कुशाग्रा जोशी की उपस्थिति में प्रतिभागियों की प्रतिपुष्टि, प्रशिक्षण उपरांत आकलन और प्रमाण पत्र वितरण के साथ किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अमित ठाकुर, डॉ. कामिनी बिष्ट और डॉ. कुशाग्रा जोशी ने किया।


